दिया 'बरकत' का जलाए रखती थी
'माँ जब तक थी'
चारदीवारी को घर बनाए रखती थी ..
'माँ जब तक थी'
चारदीवारी को घर बनाए रखती थी ..
दिनभर डांटती थी बेशक मुझे लेकिन
'माँ जब तक थी'
वो रातभर सीने से लगाए रखती थी ..
'माँ जब तक थी'
वो रातभर सीने से लगाए रखती थी ..
दबा लेती थी वो हर राज़ को दिल में
'माँ जब तक थी'
मेरे हर ऐब पर पर्दा गिराए रखती थी ..
'माँ जब तक थी'
मेरे हर ऐब पर पर्दा गिराए रखती थी ..
कभी पेट काटकर तो कभी मन मारकर
'माँ जब तक थी'
वो मेरे नाज़ - नखरे उठाए रखती थी ..
'माँ जब तक थी'
वो मेरे नाज़ - नखरे उठाए रखती थी ..
मैं लौटूं ना अगर देर रात तक वापस
'माँ जब तक थी'
रस्ते पर अपनी नज़रें गड़ाए रखती थी ..
'माँ जब तक थी'
रस्ते पर अपनी नज़रें गड़ाए रखती थी ..
बहती नदी या ठंडी हवा का झोंका थी
'माँ जब तक थी'
मुझे हर गर्म हवा से बचाए रखती थी ..
'माँ जब तक थी'
मुझे हर गर्म हवा से बचाए रखती थी ..
तितर बितर हो गए हैं सब के सब पंछी
'माँ जब तक थी'
वो अपना आशियाना सजाए रखती थी ..
'माँ जब तक थी'
वो अपना आशियाना सजाए रखती थी ..
और हाय ...! अब बस .....
खाली मकाँ और खोखली दीवारें हैं वहां
'माँ जब तक थी'
वो अपनी खुशबू से
हमारे सारे 'घर' को 'महकाए' रखती थी !!
खाली मकाँ और खोखली दीवारें हैं वहां
'माँ जब तक थी'
वो अपनी खुशबू से
हमारे सारे 'घर' को 'महकाए' रखती थी !!
By - Gaurav Kapoor
