Thursday, 15 December 2016

कभी सोचता हू लिख दू तुम पर कोई किताब

कभी सोचता हू लिख दू तुम पर कोई किताब,
फिर लगता है तुम्हारा ज़िक्र सिर्फ़ खुद से ही हो तो बेहतर.

Wednesday, 14 December 2016

Mohabbat me fijul kharchi jaruri hai


तुमसे प्यार नही कर पाउँगी

कितना कहती थी ना तुम की मे तुमसे प्यार नही कर पाउँगी, सिर्फ़ एक दोस्ती का रिश्ता चाहती हू. पर मे क्या करता, मुझे तो तुमसे उस पहली मुलाकात मे ही प्यार हो गया था. वो पल भर, जब हम साथ चले थे, मुश्किल से कुछ एक शब्द ही तो कहे होंगे मेने तुमसे, पर ये दिल ना जाने क्या क्या बोलता रहा. पता नही तुम क्या सुन रही थी, वो मेरे द्वारा कहे गये कुछ शब्द या फिर वो मेरे दिल से निकले अनेको शब्द. पर जो भी था, तुम बस नीचे देख रही थी. या तो तुम मुझे देखना नही चाहती थी, या फिर हिम्मत नही जुटा पा रही थी. हालाँकि तुमने मुझे बाद मे बताया था की मे भी तुम्हे पहली ही नज़र मे पसंद आ गया था, पर तुम आज भी उसे प्यार मानने से मना करती हो. मे जब भी किसी और लड़की से बात करता हू तो तुम रूठ जाती हो, मेरा अगर फोन बिज़ी मिलता है तो तुम तुरंत Sherlock Holmes बन जाती हो और इस तफ़तीश मे लग जाती हो कही वो कोई मेरी महिला मित्र तो नही. वैसे तुम सच मे पागल हो, तुमने उस बेचारी लड़की के लिए कितना बुरा भला कहा था, साथ मे मुझे भी जिसने बस मुझे एक कप कॉफी ला के दी थी ऑफीस मे और तुमने उसकी आवाज़ सुन ली थी, जब तुम फोन पे थी. कितना बवाल मचाया था तुमने. इतना सब के बाद भी तुम सिर्फ़ हमारे रिश्ते को दोस्ती का नाम देती आई हो, प्यार कभी ना कहा तुमने. पता नही क्यू ऐसा लगता है की एक दिन तुम आओगी और मुझसे अपने प्यार का इज़हार करोगी या फिर किसी दिन ये रिश्ता वक़्त के अंधेरे मे अपने आप खो जाएगा. पर जब तक भी है ये रिश्ता, मुझे तुमसे तुम्हारे भी प्यार का इज़हार करने का इंतज़ार रहेगा.

Ye Jo tum likh likh k mitati ho na
Agar pd pau to qyamat aa jaye...
#Abhideep_Roy

Monday, 9 May 2016

A Tribute to my Late Mother - Gaurav Kapoor

दिया 'बरकत' का जलाए रखती थी
'माँ जब तक थी'
चारदीवारी को घर बनाए रखती थी ..
दिनभर डांटती थी बेशक मुझे लेकिन
'माँ जब तक थी'
वो रातभर सीने से लगाए रखती थी ..
दबा लेती थी वो हर राज़ को दिल में
'माँ जब तक थी'
मेरे हर ऐब पर पर्दा गिराए रखती थी ..
कभी पेट काटकर तो कभी मन मारकर
'माँ जब तक थी'
वो मेरे नाज़ - नखरे उठाए रखती थी ..
मैं लौटूं ना अगर देर रात तक वापस
'माँ जब तक थी'
रस्ते पर अपनी नज़रें गड़ाए रखती थी ..
बहती नदी या ठंडी हवा का झोंका थी
'माँ जब तक थी'
मुझे हर गर्म हवा से बचाए रखती थी ..
तितर बितर हो गए हैं सब के सब पंछी
'माँ जब तक थी'
वो अपना आशियाना सजाए रखती थी ..
और हाय ...! अब बस .....
खाली मकाँ और खोखली दीवारें हैं वहां
'माँ जब तक थी'
वो अपनी खुशबू से
हमारे सारे 'घर' को 'महकाए' रखती थी !! 

By - Gaurav Kapoor

Thursday, 5 May 2016

Pankaj Sain Shayari

उठाओ उँगलियाँ हम पर, फ़कत इतना समझ लीजिये.!
हमारी शकसियत कुछ कुछ सनम आईने जैसी है.!!

#Pankaj Sain

Wednesday, 4 May 2016

हम भी वो शेर लिखेंगे एक दिन।
 आखरी होगा, पर मशहूर बहुत होगा।।

#PankajSain